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" आपने इन्हें हॉस्पिटल लाने में देर कर दी !"

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बीत जाओगे तुम भी, गुज़रते वक़्त की वार से चीर लो दरिया-ए-इश्क़, ख़ुद ही लहू की धार से। कि वक़्त के माथे पर जो अरक़ से लिखा करते हैं, उनके क़िस्मतों के क़िस्से आसमाँ में दिखा करते हैं। वक़्त को यूँ गँवा देने वालों की कोई जवानी नहीं होती, मरते हैं और मर ही जाते हैं कि कहीं कोई निशानी नहीं होती। किसने पहचाना उन्हें जो जिए सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने औलादों के वास्ते? जो मरे मिट्टी मोहब्बत के वास्ते—उनके बुत हैं और हैं उनके नाम के रास्ते। तुमने जो यूँ वर्षों बर्बाद किए, समझ कर गरमी, बरसात और सरदी,  क़ीमत समझी जब डॉक्टर ने कहा—“आपने इन्हें लाने में ही देर कर दी!” All copyrights reserved by ✍️© रजनीश कुमार मिश्र

नानी हो नानी...!

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जब जब डुबकी लगाई हम गंगा के पानी अईसन लागे जईसे हिया में साटेली नानी अईसन लागे जईसे हिया में साटेली नानी * कईसे भुलाई नानी, ऊ परी के कहानी * शिवाला के शिव जी कब्बो तोहरे से मानीं याद करके भर भर जाला २ अँखिया में पानी माथवा पर लागे हाथवा फेरsतारी नानी २ अईसन लागे जईसे हिया में साटेली नानी * हमरा के कहसss नानी अँखिया हो अँखिया * तोहरे गोदिया बईठ के करीं तोहरे से बतिया लोरवा से लिख लिख भेजीं २ पहुँचे ना पतिया के हमके कही अब, नतिया रे नतिया २ अईसन लागे जईसे हिया में साटेली नानी * चंदा पर बईठल नानी, देखेलीं जहान हो * माई के माई लेकिन हई हमार जान हो देवी माई बन के नानी २ बनावs इंसान हो प्रान के रक्षा सीखे, मानव महान हो २ अईसन लागे जईसे हिया में साटेली नानी द्वारा रचित ✍️ रजनीश कुमार मिश्र All Copy rights reserved

वो भी यार है बहार के

उतर रहा है रंग भी, देख लो ना प्यार के ! सांसों में बसने वाले भी, दुश्मन बने हैं जान के॥ उतर रहा है रंग भी, देख लो ना प्यार के! हैं इत्र की वो नदियाँ, प्यासा सागर हूँ मैं बहार के...! हृदय हार करके दे दूं, मुझे जीत लो ना प्यार से  !  उतर रहा है रंग भी, देख लो ना प्यार के! हैं सावन की गर सवरियाँ, (तो) प्यासे हैं क्यों फुहार के? कदमों में हों सितारे, गा दूँ राग जो मल्हार के! उतर रहा है रंग भी, देख लो ना प्यार के! हैं मन की गर वो मलिका, (तो) मोल है ही क्या बाज़ार के? मन मंदिर में बसने वाले, बैठे हैं मन को मार के! उतर रहा है रंग भी, देख लो ना प्यार के! हैं मिट्टी के गर खिलौने, तो कर्ज़ क्यों न हो कुम्हार के? भव पार तक के माँझी, बैठे हैं देखो हार के! उतर के भी ना उतरे, वहीं रंग है जी प्यार के! ✍️ रजनीश कुमार मिश्र ©All copy rights reserved

मदहोश ए ज़िन्दगी

उनका नशा है जो मुझपे ख़ुद ब ख़ुद चढ़ता है । ये वो रंग है जो दिन ब दिन गाढ़ा होते रहता है । बेख़बरों को क्या ख़बर कि कोई आँखों से चलता है ! दिल से देखता है तो दिन भर तबियत से मचलता है । वो पीता है, नशा में जीता है पर शाम तक ढल जाता है । वो सुबह खिलता है, महकता है और एहसाह गढ़ जाता है । कोई क़िताब ए इल्म पढ़ता है, जंग ए बारूद छेड़ता है । जज़्बात ए मोहब्ब्त आँखों का, फिर जानवर कैसे पढ़ लेता है? ये बारिश है या उनका बोसा, कोई फ़र्क नहीं लगता है । बस इसका बूंद बूंद मेरे रोम रोम में भीनने लगता है । वो भी क्या ज़िन्दगी है कि डर डर के जीना पड़ता है ? वो खुशी भी कोई क्या जिएं कि कीमत चुकानी पड़ती है ! @RajneeshKumar Mishra

She Walks with a Divine Aura

She  with a Divine Aura My legs lagged far behind, My mind completely hijacked, blind. Neck turned, eyes rolled all around To her beauty that did abound. I overheard her magical sound — A heavenly music I had found! Yet to a journey I was bound, Before that fairy touched the ground. Her oceanic eyes so profound! Her smile spread divine bliss, Those lips invited infinite kiss. Her curls like serpents that hiss, Proved her a heavenly miss. A soothing sight — none could dismiss. Now I had nowhere left to go, A friend pulled me from falling low. I forgave the scolding of the crow, Poor me became a fleeting show, Yet in my heart, the richest though. She — that spirit — vanished from sight, Leaving the greatest painful plight. My soul soared high like a kite. Was it a battle of flesh or light? She filled my being with pure delight. Composed and all the copyrights reserved by Rajneesh Kumar Mishra 

मानव: एक मशीन और प्रेम इसका स्नेहक

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घूर्णन में एक अहम् , दूसरे अहम् से टकराएगा। सजातीय ध्रुवों में विकर्षण तो अवश्य हो जाएगा। स्वयं की लपटें कभी स्वयं को लपेट जाएँगी, उस दिन अपने ही अपनों को काट-काट कर खाएगा। घिसता हुआ हर इंजन ऊष्मा लाएगा, पानी बाहर से डालकर जान बच पाएगा। प्रेम-प्रयोग ज़रूरी है, स्नेहक-सा सहलाएगा, रिस-रिस कर अंतर्मन को तृप्त करता जाएगा। आओ, करें एक संकल्प—एक-दूजे से: गर रूठें, तो एक-दूजे को प्यार से मनाया जाएगा। @रजनीश कुमार मिश्र (सभी नकल का अधिकार सुरक्षित)

दर्द का दर्द भरा दास्तां

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दर्द में ही रहकर, दर्द को ही सहकर बैठा था मन मार कर, उसने पूछा रुककर - " कवि हो ?" "कुछ लिख दो ना मुझपर !" मैंने कहा कराहकर, " लानत हो इस रोग पर !" दांत दर्द बोला चढ़ते हुए कान पर, " नाचूं तेरे शान पर, बोल तो तू सकता नहीं फिर भी ऐठन है जुबान पर ?" " क्या कवि हो यार तुम भी पड़े हो बस अपने ही चक्कर में ?" " उस मासूम का क्या ? रेप हुआ, ख़ून हुआ ! पट्टीदारी के टक्कर में ।" मैं उस दिन फिर मरा हुआ महसूस किया ! द्वारा रचित: ©रजनीश कुमार मिश्र  All Copyrights Reserved

Nature Rhyme

Teacher, teacher,   We beg your pardon ! Stop teaching in here Take us out there In that grassy garden. Here's God preaching ! Sir ! Sir ! Please ! Please ! Hush ! No, one, two, three ! Learning is for free. She wishes us to see - None is here he or she, In Her lap, all are "we". Copyright Reserved and composed by : 🇮🇳✍️ Rajneesh Kumar Mishra  

मैय्या शारदा भवानी के भजन

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हे शारदे माईss, रउरे तs बानी, जग के सहारा, जग के आधार रऊरी चरनिया, बा हमार दुनियां, सगरो आन्हार, रउरा सिवाय ब्रह्मा के बुद्धि जे, रउरा ना देंती, धरती माई जे, जन्मती ना बेटी विश्वकर्मा के जदि, ज्ञान ना भेटित, कईसे देखती जां सुनर जहानss हे शारदे माईss, रउरे तs बानी, जग के सहारा, जग के आधार रऊरी चरनिया, बा हमार दुनियां, सगरो आन्हार, रउरा सिवाय रतना के माया में, पागल तुलसी, माई के दया से, भईले देव तुल जी खूंखार डाकू वाल्मिकी, मार मार से, राम राम सीखी, हो गईले कईसे महानss हे शारदे माईss, रउरे तs बानी, जग के सहारा, जग के आधार रऊरी चरनिया, बा हमार दुनियां, सगरो आन्हार, रउरा सिवाय जिहवा पर बईठी, आँखियां में बसीं, संसिया के बंसिया, रउरे बजाईं सेवा में अपना, मैय्या जी रखीं, रउरा बिनु मन्दिर, सूना मकानss  हे शारदे माईss, रउरे तs बानी, जग के सहारा, जग के आधार रऊरी चरनिया, बा हमार दुनियां, सगरो आन्हार, रउरा सिवाय गरीबनी माई के, बेटा जिआईं, शक्ति दीं, हम खूबे पढ़ाई, सेवा आ श्रद्धा चाहीं मैय्या जी जिनगी, जरेला चाहीँ, गाछ वैईसन की फरे के चाहीं, नाही त बाss, जिअल बेकार हे शारदे माईss, र...

देखो, कौन क्या ढूंढता है !

ये धूप जो आशिक़ है, जलता है और छाँव ढूंढता है, दिल-ए-दरिया भी समंदर से मिलने को नाव ढूंढता है। वो पुजारी है जो पत्थर की मूरतों में भी पाँव ढूंढता है, वो पागल नहीं, शहरी है, शहरों में घूमकर गाँव ढूंढता है। रिश्ता कोई भी हो, इक-दूजे में प्यार का बर्ताव ढूंढता है, भगवान भी तेरा चढ़ावा नहीं, बस भक्ति-भाव ढूंढता है। परिंदा बेशक़ आसमाँ में उड़ता है, पर ठहराव ढूंढता है, तालाब पल-पल मरता है और जीने को बहाव ढूंढता है। एक शख़्स है जो शराब की हर बूँद में प्रभाव ढूंढता है, उनके होंठों की शबनम के लिए दारू एक पाव ढूंढता है। वो नमक-व्यापारी नहीं, फिर भी ज़ख़्मों के घाव ढूंढता है, अरे भाई, वो भी भाई ही है, पर हरदम दाँव ढूंढता है। आदमी गर ‘इंसा’ हो, तो इंसानियत से लगाव ढूंढता है, उसका गुरूर लुट गया, अब वो सबमें समभाव ढूंढता है। जवानी दीवानी है, हर वक़्त ऊँचा चढ़ाव ढूंढती है, मगर सच्चा प्यार हर सफ़र में इक स्थायी पड़ाव ढूंढता है। कलमगारी ✍️ रजनीश कुमार मिश्र (हक़्क़-ए-नक़्ल महफ़ूज़)

मां ही मेरी जां

हमने अब तक मौका परस्त इंसा हज़ार देखें हैं। फूलों के शक्ल में छुपे मौत का मजार देखें हैं। ख्याल है कि आपने चमकते, खनकते बाज़ार देखें हैं । हमनें सौम्य, सभ्य, समृद्ध भी बिकते कई बार देखें हैं । लोग प्यार देखें हैं, हमने मोहब्बत-ए-करोबार देखें हैं ।    ईश्क-ए-इल्म में हमने ख़ुद को अक्सर लाचार देखें हैं । आभाव है, बेबसी है, कुछ हल्की-फुल्की बीमारी है । मेरी मुफलिसी पता है ? जरूर आपने  समाचार देखें हैं । आपका हमारा यूं मिलना अब एक तकल्लुफ सा है । अब नहीं दिखता जो हमने इन आँखों में सितार देखें हैं । इस भीड़ के तहखाने से कोई मुझे आवाज़ दे रहा है । लाओ चूम लूं उन आँखों को जिसने मेरे संसार देखें हैं । हमनें धरती के फटे होठों पर गिरते रसधार देखें हैं । अश्क-ए-आसमां के सीने से ख़ून के बौछार देखें हैं । वें हैं खुशनसीब जो दरिया-ए-मुहब्बत का दीदार देखें हैं । हमनें तो मां के आँचल में स्वर्ग के सारे त्योहार देखें हैं । कलमगारी ✍️ रजनीश कुमार मिश्र  (हक़्क़-ए-नक़्ल महफ़ूज़) परिष्कृत संस्करण....! हमने अब तक मौक़ापरस्त इंसान हज़ार देखे हैं। फूलों की शक्ल में छुपे मौत के मज़ार देखे ह...

शिकवे गिले

बहार-ए-ज़िंदगी, मेरी जां, मेरा भी कभी रूख़ कर ले। एक बार ही सही, मेरी सांसों को अपनी खुश्बू से भर दे। बहार-ए-ज़िंदगी, मेरी जां, मेरा भी कभी रूख़ कर ले। सुखी मेरी आँखें, हाँ ये आँखें, फिर इन्हें झील कर दे। बेजाँ ये लब, हाँ मेरे लब, लबों को लबों से नम कर दे। बहार-ए-ज़िंदगी, मेरी जां, मेरा भी कभी रूख़ कर ले। देख, जान-ए-दुश्मन को, आ गई तरस, अब तो बस कर दे। एक बार लगा गले, रोने दे, यूं ही शिकवे-गिले कर ले। बहार-ए-ज़िंदगी, मेरी जां, मेरा भी कभी रूख़ कर ले। रोक अब सबक, ना जी ना, अब तो इम्तिहान कर ले। नाजिह या नामुराद, हाँ जी हाँ, कुछ तो ऐलान कर दे। बहार-ए-ज़िंदगी, मेरी जां, मेरा भी कभी रूख़ कर ले। माना जुर्मी हूँ, दे सजा, बस थोड़ी नर्मी कर दे। कैदखाना-सा बदन, रूह-ए-आज़ाद को जुदा कर दे।  बहार-ए-ज़िंदगी, मेरी जां, मेरा भी कभी रूख़ कर ले। अधूरा-अधमरा हूं, देख लो, घास हूं, ओस वो आश भर दे । जिन्दा हो जाऊंगा, बस तु, मुझमें जीने का ऐहसास भर दे । बहार-ए-ज़िंदगी, मेरी जां, मेरा भी कभी रूख़ कर ले। मुदई ए सुकूं,  ओ वक्त, बैठ हिसाब-किताब कर ले । है गर हैसियत, तेरी तो, मेरे छेड़े तराने भी बदरंग क...

Fog and Sun Have Fun

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Fog flies, quivering... Offspring of a roaring ocean- Tease sun in salty games. @✍️Rajneesh Kumar Mishra (Copyright Reserved)

ज्ञान यात्रा

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उद्गम द्वार से चली थी जब, थी भयकातर भीतर भीतर अबोध भी सुबोध लगा, सच में बिखरी थी तितर-बितर । मेरे जीवन की धारा में, गुरु ज्ञान धार का मिल जाना मेरे मंदिर के द्वारों पे, हो नानी के दीप का जल जाना । रिक्त श्यामपट्ट जैसा थी, पर श्याम रखी अंदर अंदर । गुरु कृपा मुझपर हुई, तब प्रभु सर्वत्र दिखे सुंदर सुंदर । सखियों का सानिध्य मिला, तो जीवन बगिया चहक उठी जलती थी जो आग यूं ही, अब हवनकुण्ड-सा महक उठी मैं चलकर ही तो आई थी, अब वक्त हुआ चलने दो । गति में ही जीवन है, ना रुको, ना रोको, जियो, जीने दो । हमने बहुत बाते करली, अब इन बातों को बुनने दो । हमने मोती बिखेरे थे, अब एक एक करके चुनने दो । हर सांस आस की बेटी है, विदा करो दिल में भरकर । वो भी जीना क्या जीना है, गर जीना हो मर मर कर ? समय परिचय ना मांगे, करो श्रम दिलो जां सौंपकर । पहचान हो ऐसा कि, वक्त जो पूछे, वक्त बताए, सब लौटकर । @Anisha

Life Lessons...!

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Self-undervalue is suicidal. Self-overvalue is genocidal. Aqua-stagnancy is ironical. Oceanic-ego is tsunamical. Self-respect has a balance. Self-dominance has violence. Rivers have two banks to flow. Floods kill wherever they go. Self-discipline is a roadmap. Unchecked-self is a rat-trap. Birds are free to fly in the sky. A moody craft takes to goodbye. Everything has an existential Calculation for our experiential Knowledge of joyous harmony. Survival roots in soil of money. Life is meant for the learning. Love is the reward of earning. Beneficial people are resource. A king sits on arms of force. First arrange fuel for the go, Wealth restores human ego. Take your life to be very easy. Universe is complex; remain busy.  @✍️ Rajneesh Kumar Mishra   ( Copyright Reserved)

ग़ज़ल ए आफताब

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मेरे उम्मीदों का दरिया अब उफान पर है । उस कश्ती की क्या क़िस्मत जो तूफ़ान पर है ? कीमत क्या लगाएगी ये दुनियां मेरे ईश्क की ? अंदाज़ा लगा लो, आख़री दांव मेरी जान पर है। लोग फूलों के शक्ल में कांटों का सौदा करते हैं । अब से यहीं तिज़ारत मुनाफे वो चालान पर है । अब मासूमों के खूँन से पानी महंगा हो गया है । लौट मछवारे, मछलियों का घर आसमान पर है । खूनी अंबर में अधकटे चाँद को चमकते देखा है । कभी बुझा नहीं वो, उसकी चमक भी शान पर है । कलमगारी ✍️ रजनीश कुमार मिश्र  (हक़्क़-ए-नक़्ल महफ़ूज़) Image Credit @Grok

हालत-ए-महबूब : एक ग़ज़ल

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ऐ काश कि मैं कभी उनसे यूं जुदा ना होता । अधूरी साँसें, भींगी आँखें व दिल भरा ना होता । बदन के लिबास जैसे पत्तियां हो, चेहरा गुलाब हो । खूबसूरती होती है पर ऐसा रह्मानी बाग ना होता । बदन है रूह-ए-पाक महल, कोई इंसानी जिस्म नहीं । ख़ुदा-ए-नूर हैं आँखों की, आपका कोई जमीं ना होता ! फरिश्ता-ए-फ़लसफ़ा, तेरे तरस पे ख़ून बरसता है मेरा । मरता सुकूँ से गर तुम्हें फूट फूट कर रोते देखा ना होता । कोई जन्नत-ए-हूर को कैसे यूं सता सकता है, मालिक ! तुझे ही मुजरिम करार देता, गर तेरा ही कानून ना होता । मेरे महबूब, हैं बहुत ही नाज़ुक मेरे भी हालात वर्ना, तेरे कदमों तले जन्नत रखता तो यूं बंजर जमीं ना होता । कलमगारी@ रजनीश कुमार मिश्र  (हक़्क़-ए-नक़्ल महफ़ूज़)

महबूब के घर जाना चाहता हूं : एक ग़ज़ल

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उनसे मिलके हाल-ए-दिल बताना चाहता हूं । आख़िरी बार ही सही प्यार जताना चाहता हूं । दौर-ए-मोहब्बत जो कभी जिया था एक साथ  वहीं दौर मैं उनसे चुराकर लाना चाहता हूं । वहम है दुनियां को कि वो मुझसे जुदा हैं । मैं भी जमाने को अपनी सांसें कहां दिखाना चाहता हूं । ऐ ख़ुदा उन्हें तमाम उम्र सेहते-आबाद रखना  जिन्हें एक बार फिर से मैं गले लगाना चाहता हूं । मेरे सफ़र-ए-जिन्दगी का अंजाम तो पता नहीं लेकिन मरते दम तक चराग-ए-इश्क जलाना चहता हूं । तुम उन्हें जो एक अदना सा ख़ातून मानते हो  मैं उन्हीं में अपनी सारी दुनियां बसाना चाहता हूं । बेशक तेरे औलादों की वो वालिदा है मगर तू शौहर-ए-जिस्म है, सच्चाई ये सुनाना चाहता हूं । निशानियां मिटती नहीं उनकी मोहब्बत का रूह से तू जब कहे तभी मैं अपना जिस्म जलाना चाहता हूं । कलमगारी ✍️© रजनीश कुमार मिश्र  (हक़्क़-ए-नक़्ल महफ़ूज़)

ज़ख्म ए आतंक

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जब जब हमने आतंकियों पर ऐतबार किया, तब तब हमने मुंह की खाई है । हमदर्दों के सफ़ेद लिबास में वो, हराम-ए-हकीम वो ज़हर का दवाई है । जिसका जन्नते अस्ल ही कत्ल वो गारत है, वो ऐसा ही भाई है । लानत है उसकी पैदाइश पर, वो अपनी मां वो बहन का कसाई है । रगों में बारूद भरा है, जैसे मांओं ने दूध नहीं अब्बाओं ने खून पिलाई है । फटना ही इनकी नियति है, इनके आकाओं ने ऐसे ही मसनद सिलाई है । मासूमों के मांस सूंघते रहते हैं ये लोग, जैसे इंसानी गोस्त खाई है । सुपुर्द-ए-खांक भी नहीं होते इनके चीथड़े, अक्सर हवा ने उड़ाई है । मोहब्बत वो इल्म को भी बनाया गुनहगार, किस दर्स-गाह ने तुम्हें ये सिखाई है । गर तू भी है इंसान कि औलाद, निकाल फेंक वहशत, तेरे खून में किसी ने मिलाई है ।  (हक़्क़-ए-नक़्ल महफ़ूज़) ✍️ रजनीश कुमार मिश्र

रुख़्सत-ए-ज़ख्म

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एक दिन शहर से आया अपने गांव के बाज़ार तक । नज़रें समेट रहीं थी नज़ारा, छितिज से मजार तक ।। जान पहचान के ही सब थे- बुंदा, बंदा से बयार तक । धुंधला था मासूमियत, नादानी, जवानी से प्यार तक ।। गांव वो घर खींच रहा था उस तरफ़, नदी के पार तक । और नहर, बगीचा, गिल्ली-डंडा भी जीत से हार तक ।  फ़िर धक्का दिया यकायक वो पीपल, कुआं वो यार तक । मां नहीं थीं वहां और बेजां था अपना घर, आंगन से द्वार तक । हिम्मत न हुई आगे बढ़ने की सो लौट आया वापसी सवार तक । यहीं कैद था भाग्य, संगिनी, बीमार मां वो जीवन के आसार तक । दास्तां-ए-वालिद जो मुबहम है, कौन लिखेगा कयामत के प्रसार तक । वो बस जिता है पल पल मर कर, तपता है सर्द से बसंती बहार तक । कलमगारी ✍️© रजनीश कुमार मिश्र  (हक़्क़-ए-नक़्ल महफ़ूज़)