Posts

Showing posts from July, 2026

वो भी यार है बहार के

उतर रहा है रंग भी, देख लो ना प्यार के! सांसों में बसने वाले भी, दुश्मन बने हैं जान के॥ उतर रहा है रंग भी, देख लो ना प्यार के! हैं इत्र की वो नदियाँ, प्यासा सागर हूँ मैं बहार के...! हृदय हार करके दे दूं, मुझे जीत लो ना प्यार से  !  उतर रहा है रंग भी, देख लो ना प्यार के! हैं सावन की गर सवरियाँ, (तो) प्यासे हैं क्यों फुहार के? कदमों में हों सितारे, गा दूँ राग जो मल्हार के! उतर रहा है रंग भी, देख लो ना प्यार के! हैं मन की गर वो मलिका, (तो) मोल है ही क्या बाज़ार के? मन मंदिर में बसने वाले, बैठे हैं मन को मार के! उतर रहा है रंग भी, देख लो ना प्यार के! हैं मिट्टी के गर खिलौने, तो कर्ज़ क्यों न हो कुम्हार के? भव पार तक के माँझी, बैठे हैं देखो हार के! उतर के भी ना उतरे, वहीं रंग है जी प्यार के! ✍️ रजनीश कुमार मिश्र ©All copy rights reserved