मदहोश ए ज़िन्दगी
उनका नशा है जो मुझपे ख़ुद ब ख़ुद चढ़ता है । ये वो रंग है जो दिन ब दिन गाढ़ा होते रहता है । बेख़बरों को क्या ख़बर कि कोई आँखों से चलता है ! दिल से देखता है तो दिन भर तबियत से मचलता है । वो पीता है, नशा में जीता है पर शाम तक ढल जाता है । वो सुबह खिलता है, महकता है और एहसाह गढ़ जाता है । कोई क़िताब ए इल्म पढ़ता है, जंग ए बारूद छेड़ता है । जज़्बात ए मोहब्ब्त आँखों का, फिर जानवर कैसे पढ़ लेता है? ये बारिश है या उनका बोसा, कोई फ़र्क नहीं लगता है । बस इसका बूंद बूंद मेरे रोम रोम में भीनने लगता है । वो भी क्या ज़िन्दगी है कि डर डर के जीना पड़ता है ? वो खुशी भी कोई क्या जिएं कि कीमत चुकानी पड़ती है ! @RajneeshKumar Mishra