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दर्द का दर्द भरा दास्तां

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दर्द में ही रहकर, दर्द को ही सहकर बैठा था मन मार कर, उसने पूछा रुककर - " कवि हो ?" "कुछ लिख दो ना मुझपर !" मैंने कहा कराहकर, " लानत हो इस रोग पर !" दांत दर्द बोला चढ़ते हुए कान पर, " नाचूं तेरे शान पर, बोल तो तू सकता नहीं फिर भी ऐठन है जुबान पर ?" " क्या कवि हो यार तुम भी पड़े हो बस अपने ही चक्कर में ?" " उस मासूम का क्या ? रेप हुआ, ख़ून हुआ ! पट्टीदारी के टक्कर में ।" द्वारा रचित: ©रजनीश कुमार मिश्र  All Copyrights Reserved

Nature Rhyme

Teacher, teacher,   We beg your pardon ! Stop teaching in here Take us out there In that grassy garden. Here's God preaching ! Sir ! Sir ! Please ! Please ! Hush ! No, one, two, three ! Learning is for free. She wishes us to see - None is here he or she, In Her lap, all are "we". Copyright Reserved and composed by : 🇮🇳✍️ Rajneesh Kumar Mishra  

मैय्या शारदा भवानी के भजन

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हे शारदे माईss, रउरे तs बानी, जग के सहारा, जग के आधार रऊरी चरनिया, बा हमार दुनियां, सगरो आन्हार, रउरा सिवाय ब्रह्मा के बुद्धि जे, रउरा ना देंती, धरती माई जे, जन्मती ना बेटी विश्वकर्मा के जदि, ज्ञान ना भेटित, कईसे देखती जां सुनर जहानss हे शारदे माईss, रउरे तs बानी, जग के सहारा, जग के आधार रऊरी चरनिया, बा हमार दुनियां, सगरो आन्हार, रउरा सिवाय रतना के माया में, पागल तुलसी, माई के दया से, भईले देव तुल जी खूंखार डाकू वाल्मिकी, मार मार से, राम राम सीखी, हो गईले कईसे महानss हे शारदे माईss, रउरे तs बानी, जग के सहारा, जग के आधार रऊरी चरनिया, बा हमार दुनियां, सगरो आन्हार, रउरा सिवाय जिहवा पर बईठी, आँखियां में बसीं, संसिया के बंसिया, रउरे बजाईं सेवा में अपना, मैय्या जी रखीं, रउरा बिनु मन्दिर, सूना मकानss  हे शारदे माईss, रउरे तs बानी, जग के सहारा, जग के आधार रऊरी चरनिया, बा हमार दुनियां, सगरो आन्हार, रउरा सिवाय गरीबनी माई के, बेटा जिआईं, शक्ति दीं, हम खूबे पढ़ाई, सेवा आ श्रद्धा चाहीं मैय्या जी जिनगी, जरेला चाहीँ, गाछ वैईसन की फरे के चाहीं, नाही त बाss, जिअल बेकार हे शारदे माईss, र...

देखो, कौन क्या ढूंढता है !

ये धूप जो आशिक़ है, जलता है और छाँव ढूंढता है, दिल-ए-दरिया भी समंदर से मिलने को नाव ढूंढता है। वो पुजारी है जो पत्थर की मूरतों में भी पाँव ढूंढता है, वो पागल नहीं, शहरी है, शहरों में घूमकर गाँव ढूंढता है। रिश्ता कोई भी हो, इक-दूजे में प्यार का बर्ताव ढूंढता है, भगवान भी तेरा चढ़ावा नहीं, बस भक्ति-भाव ढूंढता है। परिंदा बेशक़ आसमाँ में उड़ता है, पर ठहराव ढूंढता है, तालाब पल-पल मरता है और जीने को बहाव ढूंढता है। एक शख़्स है जो शराब की हर बूँद में प्रभाव ढूंढता है, उनके होंठों की शबनम के लिए दारू एक पाव ढूंढता है। वो नमक-व्यापारी नहीं, फिर भी ज़ख़्मों के घाव ढूंढता है, अरे भाई, वो भी भाई ही है, पर हरदम दाँव ढूंढता है। आदमी गर ‘इंसा’ हो, तो इंसानियत से लगाव ढूंढता है, उसका गुरूर लुट गया, अब वो सबमें समभाव ढूंढता है। जवानी दीवानी है, हर वक़्त ऊँचा चढ़ाव ढूंढती है, मगर सच्चा प्यार हर सफ़र में इक स्थायी पड़ाव ढूंढता है। कलमगारी ✍️ रजनीश कुमार मिश्र (हक़्क़-ए-नक़्ल महफ़ूज़)

मां ही मेरी जां

हमने अब तक मौका परस्त इंसा हज़ार देखें हैं। फूलों के शक्ल में छुपे मौत का मजार देखें हैं। ख्याल है कि आपने चमकते, खनकते बाज़ार देखें हैं । हमनें सौम्य, सभ्य, समृद्ध भी बिकते कई बार देखें हैं । लोग प्यार देखें हैं, हमने मोहब्बत-ए-करोबार देखें हैं ।    ईश्क-ए-इल्म में हमने ख़ुद को अक्सर लाचार देखें हैं । आभाव है, बेबसी है, कुछ हल्की-फुल्की बीमारी है । मेरी मुफलिसी पता है ? जरूर आपने  समाचार देखें हैं । आपका हमारा यूं मिलना अब एक तकल्लुफ सा है । अब नहीं दिखता जो हमने इन आँखों में सितार देखें हैं । इस भीड़ के तहखाने से कोई मुझे आवाज़ दे रहा है । लाओ चूम लूं उन आँखों को जिसने मेरे संसार देखें हैं । हमनें धरती के फटे होठों पर गिरते रसधार देखें हैं । अश्क-ए-आसमां के सीने से ख़ून के बौछार देखें हैं । वें हैं खुशनसीब जो दरिया-ए-मुहब्बत का दीदार देखें हैं । हमनें तो मां के आँचल में स्वर्ग के सारे त्योहार देखें हैं । कलमगारी ✍️ रजनीश कुमार मिश्र  (हक़्क़-ए-नक़्ल महफ़ूज़) परिष्कृत संस्करण....! हमने अब तक मौक़ापरस्त इंसान हज़ार देखे हैं। फूलों की शक्ल में छुपे मौत के मज़ार देखे ह...

शिकवे गिले

बहार-ए-ज़िंदगी, मेरी जां, मेरा भी कभी रूख़ कर ले। एक बार ही सही, मेरी सांसों को अपनी खुश्बू से भर दे। बहार-ए-ज़िंदगी, मेरी जां, मेरा भी कभी रूख़ कर ले। सुखी मेरी आँखें, हाँ ये आँखें, फिर इन्हें झील कर दे। बेजाँ ये लब, हाँ मेरे लब, लबों को लबों से नम कर दे। बहार-ए-ज़िंदगी, मेरी जां, मेरा भी कभी रूख़ कर ले। देख, जान-ए-दुश्मन को, आ गई तरस, अब तो बस कर दे। एक बार लगा गले, रोने दे, यूं ही शिकवे-गिले कर ले। बहार-ए-ज़िंदगी, मेरी जां, मेरा भी कभी रूख़ कर ले। रोक अब सबक, ना जी ना, अब तो इम्तिहान कर ले। नाजिह या नामुराद, हाँ जी हाँ, कुछ तो ऐलान कर दे। बहार-ए-ज़िंदगी, मेरी जां, मेरा भी कभी रूख़ कर ले। माना जुर्मी हूँ, दे सजा, बस थोड़ी नर्मी कर दे। कैदखाना-सा बदन, रूह-ए-आज़ाद को जुदा कर दे।  बहार-ए-ज़िंदगी, मेरी जां, मेरा भी कभी रूख़ कर ले। अधूरा-अधमरा हूं, देख लो, घास हूं, ओस वो आश भर दे । जिन्दा हो जाऊंगा, बस तु, मुझमें जीने का ऐहसास भर दे । बहार-ए-ज़िंदगी, मेरी जां, मेरा भी कभी रूख़ कर ले। मुदई ए सुकूं,  ओ वक्त, बैठ हिसाब-किताब कर ले । है गर हैसियत, तेरी तो, मेरे छेड़े तराने भी बदरंग क...

Fog and Sun Have Fun

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Fog flies, quivering... Offspring of a roaring ocean- Tease sun in salty games. @✍️Rajneesh Kumar Mishra (Copyright Reserved)