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She Walks with a Divine Aura

She  with a Divine Aura My legs lagged far behind, My mind completely hijacked, blind. Neck turned, eyes rolled all around To her beauty that did abound. I overheard her magical sound — A heavenly music I had found! Yet to a journey I was bound, Before that fairy touched the ground. Her oceanic eyes so profound! Her smile spread divine bliss, Those lips invited infinite kiss. Her curls like serpents that hiss, Proved her a heavenly miss. A soothing sight — none could dismiss. Now I had nowhere left to go, A friend pulled me from falling low. I forgave the scolding of the crow, Poor me became a fleeting show, Yet in my heart, the richest though. She — that spirit — vanished from sight, Leaving the greatest painful plight. My soul soared high like a kite. Was it a battle of flesh or light? She filled my being with pure delight. Composed and all the copyrights reserved by Rajneesh Kumar Mishra 

मानव: एक मशीन और प्रेम इसका स्नेहक

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घूर्णन में एक अहम् , दूसरे अहम् से टकराएगा। सजातीय ध्रुवों में विकर्षण तो अवश्य हो जाएगा। स्वयं की लपटें कभी स्वयं को लपेट जाएँगी, उस दिन अपने ही अपनों को काट-काट कर खाएगा। घिसता हुआ हर इंजन ऊष्मा लाएगा, पानी बाहर से डालकर जान बच पाएगा। प्रेम-प्रयोग ज़रूरी है, स्नेहक-सा सहलाएगा, रिस-रिस कर अंतर्मन को तृप्त करता जाएगा। आओ, करें एक संकल्प—एक-दूजे से: गर रूठें, तो एक-दूजे को प्यार से मनाया जाएगा। @रजनीश कुमार मिश्र (सभी नकल का अधिकार सुरक्षित)

दर्द का दर्द भरा दास्तां

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दर्द में ही रहकर, दर्द को ही सहकर बैठा था मन मार कर, उसने पूछा रुककर - " कवि हो ?" "कुछ लिख दो ना मुझपर !" मैंने कहा कराहकर, " लानत हो इस रोग पर !" दांत दर्द बोला चढ़ते हुए कान पर, " नाचूं तेरे शान पर, बोल तो तू सकता नहीं फिर भी ऐठन है जुबान पर ?" " क्या कवि हो यार तुम भी पड़े हो बस अपने ही चक्कर में ?" " उस मासूम का क्या ? रेप हुआ, ख़ून हुआ ! पट्टीदारी के टक्कर में ।" मैं उस दिन फिर मरा हुआ महसूस किया ! द्वारा रचित: ©रजनीश कुमार मिश्र  All Copyrights Reserved

Nature Rhyme

Teacher, teacher,   We beg your pardon ! Stop teaching in here Take us out there In that grassy garden. Here's God preaching ! Sir ! Sir ! Please ! Please ! Hush ! No, one, two, three ! Learning is for free. She wishes us to see - None is here he or she, In Her lap, all are "we". Copyright Reserved and composed by : 🇮🇳✍️ Rajneesh Kumar Mishra  

मैय्या शारदा भवानी के भजन

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हे शारदे माईss, रउरे तs बानी, जग के सहारा, जग के आधार रऊरी चरनिया, बा हमार दुनियां, सगरो आन्हार, रउरा सिवाय ब्रह्मा के बुद्धि जे, रउरा ना देंती, धरती माई जे, जन्मती ना बेटी विश्वकर्मा के जदि, ज्ञान ना भेटित, कईसे देखती जां सुनर जहानss हे शारदे माईss, रउरे तs बानी, जग के सहारा, जग के आधार रऊरी चरनिया, बा हमार दुनियां, सगरो आन्हार, रउरा सिवाय रतना के माया में, पागल तुलसी, माई के दया से, भईले देव तुल जी खूंखार डाकू वाल्मिकी, मार मार से, राम राम सीखी, हो गईले कईसे महानss हे शारदे माईss, रउरे तs बानी, जग के सहारा, जग के आधार रऊरी चरनिया, बा हमार दुनियां, सगरो आन्हार, रउरा सिवाय जिहवा पर बईठी, आँखियां में बसीं, संसिया के बंसिया, रउरे बजाईं सेवा में अपना, मैय्या जी रखीं, रउरा बिनु मन्दिर, सूना मकानss  हे शारदे माईss, रउरे तs बानी, जग के सहारा, जग के आधार रऊरी चरनिया, बा हमार दुनियां, सगरो आन्हार, रउरा सिवाय गरीबनी माई के, बेटा जिआईं, शक्ति दीं, हम खूबे पढ़ाई, सेवा आ श्रद्धा चाहीं मैय्या जी जिनगी, जरेला चाहीँ, गाछ वैईसन की फरे के चाहीं, नाही त बाss, जिअल बेकार हे शारदे माईss, र...

देखो, कौन क्या ढूंढता है !

ये धूप जो आशिक़ है, जलता है और छाँव ढूंढता है, दिल-ए-दरिया भी समंदर से मिलने को नाव ढूंढता है। वो पुजारी है जो पत्थर की मूरतों में भी पाँव ढूंढता है, वो पागल नहीं, शहरी है, शहरों में घूमकर गाँव ढूंढता है। रिश्ता कोई भी हो, इक-दूजे में प्यार का बर्ताव ढूंढता है, भगवान भी तेरा चढ़ावा नहीं, बस भक्ति-भाव ढूंढता है। परिंदा बेशक़ आसमाँ में उड़ता है, पर ठहराव ढूंढता है, तालाब पल-पल मरता है और जीने को बहाव ढूंढता है। एक शख़्स है जो शराब की हर बूँद में प्रभाव ढूंढता है, उनके होंठों की शबनम के लिए दारू एक पाव ढूंढता है। वो नमक-व्यापारी नहीं, फिर भी ज़ख़्मों के घाव ढूंढता है, अरे भाई, वो भी भाई ही है, पर हरदम दाँव ढूंढता है। आदमी गर ‘इंसा’ हो, तो इंसानियत से लगाव ढूंढता है, उसका गुरूर लुट गया, अब वो सबमें समभाव ढूंढता है। जवानी दीवानी है, हर वक़्त ऊँचा चढ़ाव ढूंढती है, मगर सच्चा प्यार हर सफ़र में इक स्थायी पड़ाव ढूंढता है। कलमगारी ✍️ रजनीश कुमार मिश्र (हक़्क़-ए-नक़्ल महफ़ूज़)

मां ही मेरी जां

हमने अब तक मौका परस्त इंसा हज़ार देखें हैं। फूलों के शक्ल में छुपे मौत का मजार देखें हैं। ख्याल है कि आपने चमकते, खनकते बाज़ार देखें हैं । हमनें सौम्य, सभ्य, समृद्ध भी बिकते कई बार देखें हैं । लोग प्यार देखें हैं, हमने मोहब्बत-ए-करोबार देखें हैं ।    ईश्क-ए-इल्म में हमने ख़ुद को अक्सर लाचार देखें हैं । आभाव है, बेबसी है, कुछ हल्की-फुल्की बीमारी है । मेरी मुफलिसी पता है ? जरूर आपने  समाचार देखें हैं । आपका हमारा यूं मिलना अब एक तकल्लुफ सा है । अब नहीं दिखता जो हमने इन आँखों में सितार देखें हैं । इस भीड़ के तहखाने से कोई मुझे आवाज़ दे रहा है । लाओ चूम लूं उन आँखों को जिसने मेरे संसार देखें हैं । हमनें धरती के फटे होठों पर गिरते रसधार देखें हैं । अश्क-ए-आसमां के सीने से ख़ून के बौछार देखें हैं । वें हैं खुशनसीब जो दरिया-ए-मुहब्बत का दीदार देखें हैं । हमनें तो मां के आँचल में स्वर्ग के सारे त्योहार देखें हैं । कलमगारी ✍️ रजनीश कुमार मिश्र  (हक़्क़-ए-नक़्ल महफ़ूज़) परिष्कृत संस्करण....! हमने अब तक मौक़ापरस्त इंसान हज़ार देखे हैं। फूलों की शक्ल में छुपे मौत के मज़ार देखे ह...