घूर्णन में एक अहम् , दूसरे अहम् से टकराएगा। सजातीय ध्रुवों में विकर्षण तो अवश्य हो जाएगा। स्वयं की लपटें कभी स्वयं को लपेट जाएँगी, उस दिन अपने ही अपनों को काट-काट कर खाएगा। घिसता हुआ हर इंजन ऊष्मा लाएगा, पानी बाहर से डालकर जान बच पाएगा। प्रेम-प्रयोग ज़रूरी है, स्नेहक-सा सहलाएगा, रिस-रिस कर अंतर्मन को तृप्त करता जाएगा। आओ, करें एक संकल्प—एक-दूजे से: गर रूठें, तो एक-दूजे को प्यार से मनाया जाएगा। @रजनीश कुमार मिश्र (सभी नकल का अधिकार सुरक्षित)
उनका नशा है जो मुझपे ख़ुद ब ख़ुद चढ़ता है । ये वो रंग है जो दिन ब दिन गाढ़ा होते रहता है । बेख़बरों को क्या ख़बर कि कोई आँखों से चलता है ! दिल से देखता है तो दिन भर तबियत से मचलता है । वो पीता है, नशा में जीता है पर शाम तक ढल जाता है । वो सुबह खिलता है, महकता है और एहसाह गढ़ जाता है । कोई क़िताब ए इल्म पढ़ता है, जंग ए बारूद छेड़ता है । जज़्बात ए मोहब्ब्त आँखों का, फिर जानवर कैसे पढ़ लेता है? ये बारिश है या उनका बोसा, कोई फ़र्क नहीं लगता है । बस इसका बूंद बूंद मेरे रोम रोम में भीनने लगता है । वो भी क्या ज़िन्दगी है कि डर डर के जीना पड़ता है ? वो खुशी भी कोई क्या जिएं कि कीमत चुकानी पड़ती है ! @RajneeshKumar Mishra
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