मां ही मेरी जां
हमने अब तक मौका परस्त इंसा हज़ार देखें हैं।
फूलों के शक्ल में छुपे मौत का मजार देखें हैं।
ख्याल है कि आपने चमकते, खनकते बाज़ार देखें हैं ।
हमनें सौम्य, सभ्य, समृद्ध भी बिकते कई बार देखें हैं ।
लोग प्यार देखें हैं, हमने मोहब्बत-ए-करोबार देखें हैं । ईश्क-ए-इल्म में हमने ख़ुद को अक्सर लाचार देखें हैं ।
आभाव है, बेबसी है, कुछ हल्की-फुल्की बीमारी है ।
मेरी मुफलिसी पता है ? जरूर आपने समाचार देखें हैं ।
आपका हमारा यूं मिलना अब एक तकल्लुफ सा है ।
अब नहीं दिखता जो हमने इन आँखों में सितार देखें हैं ।
इस भीड़ के तहखाने से कोई मुझे आवाज़ दे रहा है । लाओ चूम लूं उन आँखों को जिसने मेरे संसार देखें हैं ।
हमनें धरती के फटे होठों पर गिरते रसधार देखें हैं । अश्क-ए-आसमां के सीने से ख़ून के बौछार देखें हैं ।
वें हैं खुशनसीब जो दरिया-ए-मुहब्बत का दीदार देखें हैं ।
हमनें तो मां के आँचल में स्वर्ग के सारे त्योहार देखें हैं ।
कलमगारी ✍️ रजनीश कुमार मिश्र
(हक़्क़-ए-नक़्ल महफ़ूज़)
परिष्कृत संस्करण....!
हमने अब तक मौक़ापरस्त इंसान हज़ार देखे हैं।
फूलों की शक्ल में छुपे मौत के मज़ार देखे हैं।
ख़याल है कि आपने चमकते, खनकते बाज़ार देखे हैं,
हमने सौम्य, सभ्य, समृद्ध भी बिकते कई बार देखे हैं।
लोग प्यार देखते हैं, हमने मोहब्बत-ए-कारोबार देखे हैं,
इश्क़-ए-इल्म में हमने ख़ुद को अक्सर लाचार देखे हैं।
आभाव है, बेबसी है, कुछ हल्की-फुल्की बीमारी है,
मेरी मुफ़लिसी पता है? ज़रूर आपने समाचार देखे हैं।
आपका-हमारा यूँ मिलना अब एक तकल्लुफ़-सा है,
अब नहीं दिखते वो, जो हमने इन आँखों में सितारे देखे हैं ।
इस भीड़ के तहख़ाने से कोई मुझे आवाज़ दे रहा है,
लाओ चूम लूँ उन आँखों को, जिन्होंने मेरे संसार देखे हैं।
हमने धरती के फटे होंठों पर गिरती रसधार देखी है,
अश्क़-ए-आसमाँ के सीने से ख़ून की बौछार देखी है।
वे हैं खुशनसीब, जो दरिया-ए-मोहब्बत का दीदार देखते हैं,
हमने तो माँ के आँचल में स्वर्ग के सारे त्योहार देखे हैं।
कलमगारी ✍️
रजनीश कुमार मिश्र
(हक़-ए-नक़्ल महफ़ूज़)
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