" आपने इन्हें हॉस्पिटल लाने में देर कर दी !"

बीत जाओगे तुम भी, गुज़रते वक़्त की वार से
चीर लो दरिया-ए-इश्क़, ख़ुद ही लहू की धार से।

कि वक़्त के माथे पर जो अरक़ से लिखा करते हैं,
उनके क़िस्मतों के क़िस्से आसमाँ में दिखा करते हैं।

वक़्त को यूँ गँवा देने वालों की कोई जवानी नहीं होती,
मरते हैं और मर ही जाते हैं कि कहीं कोई निशानी नहीं होती।

किसने पहचाना उन्हें जो जिए सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने औलादों के वास्ते?
जो मरे मिट्टी मोहब्बत के वास्ते—उनके बुत हैं और हैं उनके नाम के रास्ते।

तुमने जो यूँ वर्षों बर्बाद किए, समझ कर गरमी, बरसात और सरदी, 
क़ीमत समझी जब डॉक्टर ने कहा—“आपने इन्हें लाने में ही देर कर दी!”
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✍️© रजनीश कुमार मिश्र

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