दर्द का दर्द भरा दास्तां
दर्द में ही रहकर, दर्द को ही सहकर
बैठा था मन मार कर, उसने पूछा रुककर -
" कवि हो ?" "कुछ लिख दो ना मुझपर !"
मैंने कहा कराहकर, " लानत हो इस रोग पर !"
दांत दर्द बोला चढ़ते हुए कान पर, " नाचूं तेरे शान पर,
बोल तो तू सकता नहीं फिर भी ऐठन है जुबान पर ?"
" क्या कवि हो यार तुम भी पड़े हो बस अपने ही चक्कर में ?"
" उस मासूम का क्या ? रेप हुआ, ख़ून हुआ ! पट्टीदारी के टक्कर में ।"
द्वारा रचित: ©रजनीश कुमार मिश्र
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