Posts

चांद से चंदा का नैना मिला

Image
जो चांद से चंदा का नैना मिला तो चांदी बदन चम्पा सा खिलाss । मुझे भी कहीं, है देखी कभी ? मेरी शाम-वो-सहर, है तू आठोंपहर । तू श्याम, बस नाम, बसा ले, दिलों में अभीss...। जो चांद से चंदा का नैना मिला तो चांदी बदन चम्पा सा खिलाss । क्या चंदा तुझे, है भी ख़बर ? तू भौरा की है, जान-ए-जिगर । है ख़ाब, कि आब, पिला दे, लबों से कभी ss...। जो चांद से चंदा का नैना मिला तो चांदी बदन चम्पा सा खिलाss । मैं तुझको जो देखूं , तो अपना लगे तू । जो ख़ुदको मैं देखूं , तो सपना लगे तू । तू आ जा, समा जा , बदन में, हवा बनादे तू मिट्टी मेरीss...। जो चांद से चंदा का नैना मिला तो चांदी बदन चम्पा सा खिलाss । फ़कीर-ए-इश्क , बनेगा जो बादल  आशिक आवारा , तो होगें ना पागल । रात रानी, बनेगी कहानी, देखो , ख़ुदाया है खुशबू उड़ीss...। ~मेरे गीत... ✍️© रजनीश कुमार मिश्र (हक़्क़-ए-नक़्ल महफ़ूज़)

बिहार, बिहारी और छठ : छठी मईया के श्री चरणों में सादर समर्पित एक ग़ज़ल !

Image
हम बिहार-ए-बाशिंदा एक ख़ास तेहवार करते हैं । जान वो जिगर से सूरज का इबादत वो प्यार करते हैं । ढलते हुए सिराज पर दिल वो जां निसार करते हैं । फर्ज़ के आबे दरिया में छठी मईया का दीदार करते हैं । मत पूछ मेरी जां, कि बिहारी कैसा व्यवहार करते हैं । पूरी कायनात के लिए, रिफ़ाह-ए-आम का एहतराम करते हैं । सारे मजहबों के मालिक, शिरकत करें हम आह्वान करते हैं । कुदरती सौग़ात हैं, हम इंसा हैं, इंसा से प्यार करते हैं। गन्ना, मौसमी फल, लज़ीज़-ए-ख़ास खस्ता चढ़ाया करते हैं । रहें देश या परदेश, अम्मा के लाल आंचल में समाया करते हैं । ।। जय छठी मईया ।। छठ महापर्व पर जगत जननी के प्रति अपार श्रद्धा व अटूट विश्वास के साथ...! आपका  ✍️©रजनीश कुमार मिश्र (हक़्क़-ए-नक़्ल महफ़ूज़)

मालिक ने ख़ुदी बसायी है बस्तियां : एक ग़ज़ल

Image
बहुत बातें बनाली हमने, ज़िंदगी-ए-कारोबार में । गुफ़्तुगू-ए-ख़्वाहिश है तुमसे, साईकिल की सवार में। मरहम वो ज़न्नत-ए-दीद है, तेरी सरबती आँखों की खुमार में। उफ़ ! हर चीज़ बिक रही है यहां, हाय! आग लगी है बाज़ार में । सवाद खूब है देहाती चटनी में, अम्मी-दादी वो नानी की आचार में । चलो एक झोपड़ा बनाते हैं, सब बेचकर बाग वो बहार में। पैराकी काफ़ी करली हमने अबतक, आब-ए-ठहराव में । बस चलो अब वहीं चलें-गांव, झील-ए-बहाव के नाव में । शबनम-ए-ख़ास का बुलावा है बे-जुराब, चांदनी 'अब्र की ठाँव में। शहरों में सिंगार-ए-चमक बहुत है, ख़ुदी की गर्द है गंदी बयार में । देहातों में क़रार-वो-प्यार बहुत है, रिश्ता वो रास्ती है हरेक इकरार में । मालिक ने ख़ुदी बसायी है बस्तियां, अपने पलकों की छांव में । बहुत बातें बना ली हमने, ज़िंदगी-ए-कारोबार में । गुफ़्तुगू-ए-ख़्वाहिश है तुमसे, साईकिल की सवार में। ज्यादा जी लिया जहन्नम ए जिंदगी, आओ चलें जन्नत के गांव में। हक़्क़-ए-नक़्ल महफ़ूज़... ✍️© रजनीश कुमार मिश्र

ज़न्नते मोहब्बत: एक ग़ज़ल

Image
तुम यूं जो छेड़ दोगी दिल को, तो सर-ए-शाम हो जायेगी। देख जमाना बुरा है, बात करके ही बदनाम हो जायेगी।। गर तू जो ईश्क में, यूं बदनाम हो जायेगी । गुजरे आशिकों की, फिर से कत्ले आम हो जायेगी ।। तुम यूं जो छेड़ दोगी दिल को, तो सर-ए-शाम हो जायेगी। देख जमाना बुरा है, बात करके ही बदनाम हो जायेगी।। बात न कर मेरे दीवानेपन की, वर्ना फिर दीवानी हो जायेगी । हुज़ूर तेरे अश्क-ए-पानी, कहीं मेरे खून की सुनामी हो जायेगी ।। तुम यूं जो छेड़ दोगी दिल को, तो सर-ए-शाम हो जायेगी। देख जमाना बुरा है, बात करके ही बदनाम हो जायेगी।। तेरी आंखों में देख के, मेरी आँखें भी आब-ए-हयात की रवानी हो जायेगी । तेरा मुझ पर यूं तरस आना, वफ़ा की इक नई कहानी हो जायेगी ।। तुम यूं जो छेड़ दोगी दिल को, तो सर-ए-शाम हो जायेगी। देख जमाना बुरा है, बात करके ही बदनाम हो जायेगी।। मेरे साथ है जो तेरा इश्क़-ए-नूर, तो मेरे दिल-ए-गलियां रौशन हो जायेगी । दुनिया रोकेगी हमें मिलने से यहां, ज़न्नत-ए-इश्क़ ए चमन में तू मेरी हो जायेगी ।। हक़्क़-ए-नक़्ल महफ़ूज़...! ✍️© रजनीश कुमार मिश्र  

मैं सिपाही हूं, आशिक-आवारा हुआ हूं!

Image
मैं दौर-ए-दर्द का इक सहारा हुआ हूं । ताज़-ए-सर-जमीं का सितारा हुआ हूं ।। मैं दौर-ए-दर्द का इक सहारा हुआ हूं ।। मैं सिपाही हूं, आशिक-आवारा हुआ हूं। मुझे नासमझss -२ तू ना समझss । मैं फलक से वतन पे उतारा हुआ हूं ।। मैं दौर-ए-दर्द का इक सहारा हुआ हूं । मैं सिपाही हूं, आशिक-आवारा हुआ हूं।। मेरे खून-ए-ज़िगर-२ तू मरहम है । मैं मां के पैरों का महावर हुआ हूं ।। मैं दौर-ए-दर्द का इक सहारा हुआ हूं । मैं सिपाही हूं, आशिक-आवारा हुआ हूं।। दूद-ए-मादर का असर-२ मेरा फ़र्ज़ है । ईश्क-ए-रूहानी-बाग का, मैं कुंवारा हुआ हूं ।। मैं दार-ए-दर्द का इक सहारा हुआ हूं । मैं सिपाही हूं, आशिक-आवारा हुआ हूं।। मेरे बूढ़े बाबा-२ तू अनाज है । मैं तेरे पसीने से संवारा हुआ हूं ।। मैं दार-ए-दर्द का इक सहारा हुआ हूं । मैं सिपाही हूं, आशिक-आवारा हुआ हूं। हक़्क़-ए-नक़्ल महफ़ूज़...! ✍️© रजनीश कुमार मिश्र

Sleeping Tree

Image
Seeing a sleeping tree  Calm and cool in the dark With chirps of a lone cricket Is as mournful as the funeral of an art. A swarm of fireflies Enters twinkling into its cover To drag my vision to its big fruits, Resting birds, sticking insects, cobwebs And galls of mites, hornets and wasps all full of lives. Artist better knows who holds whom. May death be full of vivid forms of lives ! ✍️© Rajneesh Kumar Mishra (Copyright Reserved)

'He' and 'She' : The Root Forms of Lives

Image
Root of 'me' in the 'she' form, Argued with me, the root 'he' form ; Over 'his' logical behaviour, As 'he' form has his wit heavier. As a root 'she' form forms human-forms So she's tender without worldly norms. My this case too isn't unique ; 'She's' the tenderest, now old and weak. I feel 'her' in my humble heart's fabrics, And 'him' in the clever brain's tactics. My heart can't anymore hold her tears As it's overfilled in thirty-six long years. O, Holy Nature ! Your brain's the hard 'Quarters', To protect the nourishing heart's holy 'Waters' ! ✍️ ©Rajneesh Kumar Mishra  (Copyright Reserved )