घूर्णन में एक अहम् , दूसरे अहम् से टकराएगा। सजातीय ध्रुवों में विकर्षण तो अवश्य हो जाएगा। स्वयं की लपटें कभी स्वयं को लपेट जाएँगी, उस दिन अपने ही अपनों को काट-काट कर खाएगा। घिसता हुआ हर इंजन ऊष्मा लाएगा, पानी बाहर से डालकर जान बच पाएगा। प्रेम-प्रयोग ज़रूरी है, स्नेहक-सा सहलाएगा, रिस-रिस कर अंतर्मन को तृप्त करता जाएगा। आओ, करें एक संकल्प—एक-दूजे से: गर रूठें, तो एक-दूजे को प्यार से मनाया जाएगा। @रजनीश कुमार मिश्र (सभी नकल का अधिकार सुरक्षित)
Comments
Post a Comment