देखो, कौन क्या ढूंढता है !
ये धूप जो आशिक है, जलता है और छांव ढूंढता है । दिल-ए-दरिया भी समंदर से मिलने को नाव ढूंढता है । वो पुजारी है जो पत्थर की मूर्तियों के भी पांव ढूंढता है । वो पागल नही, शहरी है, शहरों में घूमकर गांव ढूंढता है । रिश्ता कोई भी हो, एक दूजे में प्यार का बर्ताव ढूंढता है, भगवान भी तेरा चढ़ावा नहीं, बस भक्ति-भाव ढूंढता है । परिंदा बेसक आसमां में उड़ता है, पर ठहराव ढूंढता है । तालाब पल पल मरता है और जीने को बहाव ढूंढता है । एक शख़्स है जो शराब के हर बूंद में प्रभाव ढूंढता है, उनके होठों के शबनम के लिए दारू एक पाव ढूंढता है । वो नमक व्यापारी नहीं, पर ज़ख्म और घाव ढूंढता है । अरे भाई, वो भी भाई ही है पर हरदम दांव ढूंढता है । आदमी गर इंसा हो, तो इंसानियत से लगाव ढूंढता है । उसका गुरूर लूट गया, अब वो सबमें समभाव ढूंढता है। जवानी बड़ी दिवानी है हरदम ऊंचाई वो चढ़ाव ढूंढती है। पर सच्चा प्यार जुड़ाव, फैलाव वो स्थाई पड़ाव ढूंढता है । कलमगारी ✍️ रजनीश कुमार मिश्र (हक़्क़-ए-नक़्ल महफ़ूज़) (1) परिष्कृत एवं संशोधित ग़ज़ल (अर्थ, भाव और शिल्प को बनाए रखते हुए केवल भाषा, व्याकरण और प्रवाह सुधारा गया है) य...