ग़ज़ल ए आफताब
मेरे उम्मीदों का दरिया अब उफान पर है । उस कश्ती की क्या क़िस्मत जो तूफ़ान पर है ? कीमत क्या लगाएगी ये दुनियां मेरे ईश्क की ? अंदाज़ा लगा लो, आख़री दांव मेरी जान पर है। लोग फूलों के शक्ल में कांटों का सौदा करते हैं । अब से यहीं तिज़ारत मुनाफे वो चालान पर है । अब मासूमों के खूँन से पानी महंगा हो गया है । लौट मछवारे, मछलियों का घर आसमान पर है । खूनी अंबर में अधकटे चाँद को चमकते देखा है । कभी बुझा नहीं वो, उसकी चमक भी शान पर है । कलमगारी ✍️ रजनीश कुमार मिश्र (हक़्क़-ए-नक़्ल महफ़ूज़) Image Credit @Grok