शिकवे गिले
बहार-ए-ज़िंदगी, मेरी जां, मेरा भी कभी रूख़ कर ले। एक बार ही सही, मेरी सांसों को अपनी खुश्बू से भर दे। बहार-ए-ज़िंदगी, मेरी जां, मेरा भी कभी रूख़ कर ले। सुखी मेरी आँखें, हाँ ये आँखें, फिर इन्हें झील कर दे। बेजाँ ये लब, हाँ मेरे लब, लबों को लबों से नम कर दे। बहार-ए-ज़िंदगी, मेरी जां, मेरा भी कभी रूख़ कर ले। देख, जान-ए-दुश्मन को, आ गई तरस, अब तो बस कर दे। एक बार लगा गले, रोने दे, यूं ही शिकवे-गिले कर ले। बहार-ए-ज़िंदगी, मेरी जां, मेरा भी कभी रूख़ कर ले। रोक अब सबक, ना जी ना, अब तो इम्तिहान कर ले। नाजिह या नामुराद, हाँ जी हाँ, कुछ तो ऐलान कर दे। बहार-ए-ज़िंदगी, मेरी जां, मेरा भी कभी रूख़ कर ले। माना जुर्मी हूँ, दे सजा, बस थोड़ी नर्मी कर दे। कैदखाना-सा बदन, रूह-ए-आज़ाद को जुदा कर दे। बहार-ए-ज़िंदगी, मेरी जां, मेरा भी कभी रूख़ कर ले। अधूरा-अधमरा हूं, देख लो, घास हूं, ओस वो आश भर दे । जिन्दा हो जाऊंगा, बस तु, मुझमें जीने का ऐहसास भर दे । बहार-ए-ज़िंदगी, मेरी जां, मेरा भी कभी रूख़ कर ले। मुदई ए सुकूं, ओ वक्त, बैठ हिसाब-किताब कर ले । है गर हैसियत, तेरी तो, मेरे छेड़े तराने भी बदरंग क...